क्या मेरा राष्ट्र के प्रति चिन्तन गलत है।

मेरे एक मित्र से बात हो रही थी कुछ दिन पूर्व, उन्होने मुझसे प्रश्न किय कि मैं मुस्लिमों का इतना विरोध क्यों करता हूँ? यह प्रश्न सुन कर मैं हतप्रभ रह गया।राष्ट्र के प्रति मेरी संवेदना उसकी सुरक्षा के प्रति मेरी चिन्ता को एक समुदाय विशेष के विरोध से कितनी सरलता से जोड दिया उन्होने। उस पर तुर्रा यह कि "रवीन्द्र पहले मैं भी ऐसा ही सोचता था, परन्तु जब से मेरे office के कुछ मुस्लिम बन्धुओं के सम्पर्क मे आया हूँ मेरी सोच बदल गई है।" अर्थात मैं भी मुस्लिमों के सम्पर्क मे आऊँ, और अपनी सोच बदलूँ। पर मैं तो पहले भी मुस्लिमों के सम्पर्क मे रहा हूँ और अभी भी हूँ, अपितु मैं तो मुस्लिम राष्ट्र मे कार्य भी कर चुका हूँ। पर मेरा विरोध मुस्लिमों से तो है हि नहीं। मैं मुस्लिमों का नही राष्ट्र विरोधी विचारधारा क विरोध करता हूँ, उसके प्रवर्तक चाहे महबूबा मुफ्ती हो अथवा रामविलास, तस्लीमुद्दीन हो या दिग्विजय, चीन समर्थक हो या पाक, अमेरीकी लाबी हो या रूसी, मैं इन सबसे निरपेक्ष रह कर राष्ट्र हित मे अपने विचार रखता हूँ। अब यदि कोई समुदाय अगर इसके निशाने पर आता है तो क्या मुझे राष्ट्र हित छोड उस समुदाय के प्रसन्नता का ध्यान रखना होगा?अब मेरी चिन्ताऍ क्या हैं इस पर एक नज़र डाल लेते हैं:-
१.बाँग्लादेशी घूसपैठ –काँग्रेस सरकार (आसाम) इन्हे नागरिकता प्रमाण पत्र एवं अन्य दस्तावेज़ उपलब्ध करा रही है मात्र वोट बैंक की खातिर।राम विलास पासवान बाँग्लादेशी घूसपैठियों को नागरिकता देने की खुले आम वकालत कर चुके हैं, क्यों यह सर्वविदित है।बाँग्लादेशी घूसपैठिए कानून व्यवस्था के लिये बडा खतरा बन रहे हैं, मादक द्रव्यों के व्यापार मे, हथियारों की तस्करी में, चोरी, लूट, छीना झपटी इत्यादि मे इनकी भूमिका सर्वविदित है।
२.धर्मान्तरण - चर्च एवं अरब देश भारत मे धर्मन्तरण हेतु पानी कि तरह पैसा बहा रहे हैं। आज के युग मे कोइ भी निरुद्देश्य पैसा कहीं नही लगाता। चर्च के द्वारा पूर्वोत्तर मे भारत द्रोही गतिविधियों को प्रश्रय एवं कश्मीर मे अरब देशो का अलगाववादियों को समर्थन इसका सटीक उदाहरण हैं।
३.कश्मीर - कश्मीर में अलगाववादियों को सदैव ही हाथों हाथ लिया जाता रहा है, चाहे वो वहाँ के राजनेताओं के द्वारा हो या यहाँ की मीडीया। वह अलगाववादी जिनको स्थानीय निवासी भी अपना नुमाइन्दा मानने से इन्कार कर देगे इस भय से आज तक इन सबने कोइ चुनाव मे भाग नहि लिया, उन सबको मीडीया ने सर पर चढा कर रखा है। इन भारत द्रोहियों को सदैव ही समाचारों मे राष्ट्र समर्थक गुटों से अधिक coverage मिलता है। यहा पर वो चाहे हिन्दु क समाचार पत्र हो अथवा मुस्लिम का। दो वर्ष पूर्व जब जम्मु मे अमरनाथ यात्रा के समर्थन मे आन्दोलन चल रहा था तब सब्ने देखा TV पर कि घाटी मे पाक का झण्डा लहराया जा रहा था और जम्मु मे तिरन्गा। एक tv channel ने महबूबा को अपने यहा बुलाया, महबूबा ने निर्लज्जता पूर्वक सब्के साम्ने घाटी के आन्दोलन को शान्तीप्रिय एवं राष्ट्रवादी बोला एवं जम्मु के आन्दोलन को राष्ट्रद्रोही, परन्तु नरेन्द्र मोदी को बात बात पर आईना दिखाने वाले मीडीया के लोगो मे इतनी भी हिम्मत नही हुई कि अपने ही यहाँ प्रसारित समाचार के clip दिखा कर उसके झूठ का पर्दाफाश कर सकें।
४.हिन्दुओं कि उपेक्षा - क्षमा करें मैं यहाँ मुस्लिम विरोध कि बात नहि अपितु हिन्दुओँ कि उपेक्षा एवं शासन द्वारा ताड़ना की बात कर रहा हूँ। जहाँ शेष धर्मावलम्बीः-
a. धर्म यात्रा पर छूट पाते हैं
b. धर्मान्तरण पर सरकारी ऋण से मुक्ति पाते है
c. धार्मिक संस्थाए सरकारी नियन्त्रण से पूर्णतः मुक्त होती हैं, कोई भी जवाबदेही नहीं होती है समाज़ एवं शासन के प्रति
वहीं हिन्दू
१.हिन्दु अतिरिक्त अधिभार देने को विवश होते हैं।
२.सरकारी ऋण मे कोई अतिरिक्त छूट नही पाते
३.अधिकांश धार्मिक संगठन शासन के नियन्त्रण मे हैं,
संस्थान द्वारा अर्जित राशि का उपयोग अन्यत्र होता है
अन्य धर्मावलम्बियों को इन संस्थानो से सुविधा प्रदान करते हैं
आप यहाँ प्रश्न करेंगे कि क्या मेरी यह चिन्ता राष्ट्र की अपेक्षा धर्म की नहीं है, तो मेरा उत्तर है नहीं। नेहरु ने कश्मीर विलय के समय कश्मीर की विशिष्ठ संस्क्रुति बनाये रखने कि उद्घोषणा की एवं इसकी पूनरावॄति गोवा स्वाधीनता के समय की। मेरा प्रश्न है कि कश्मीर, गोवा, एवं पाण्डिचेरी की विशिष्ठ संस्कृति है, क्या इस देश की नही है? और अगर है, तो क्या वह हिन्दु संस्कृति से अलग है? आखिर इसकी संरक्षा कौन करेगा?
५.अनावश्यक एवं हिंसक विरोध - विश्व के किसी भी भाग में कोई घटना की खबर आये उसकी सत्यता जाने बगैर यहाँ के राष्ट्रीय समाज़ पर हिंसक वारदातें प्रारम्भ हो जाती हैं
उदाहरणः-डेनमार्क मे मुहम्मद के cartoon छपे, दंगे हुए लखनऊ में।
दिल्ली मे कुरान के जलाए जाने कि खबर आई, बाद मे मालूम हुआ अफवाह थी, तब तक कानपुर मे दंगे भडक
चुके थे।
तुर्की मे खलीफा का पद समाप्त किया एक तुर्क ने, दंगे हुए केरल में।
बाबरी ढाचा गिराने पर देश भर मे दंगे। अहमदाबाद दंगों के पश्चात देश मे जगह जगह बम विस्फोट। हिन्दुओं ने तो
आज तक कश्मीर पर प्रतिक्रिया नही की।
आप पूछ सक्ते हैं कि यह राष्ट्रीय प्रश्न कैसे हुआ, तो बन्धु अगर एक समुदाय दूसरे समुदाय के प्रति आक्रामक रुख रखेगा तो आपसी विश्वास का अभाव रहेगा जो राष्ट्र के लिये घातक है।
६.अलगाववादियों को प्रश्रय - कहीं भी कोई अलगाववादी घटना होती है और कोई अल्पसंख्यक पकडा जाता है, तुरन्त उस पर लीपापोती प्रारम्भ हो जाती है।पूरा प्रयत्न रहता है उन्हे दोष मुक्त सिद्ध करने का। तमाम तर्क दिये जाते हैं, यथा - दोष सिद्ध करना अदालत का कार्य है। परन्तु कोई हिन्दु तनिक गर्जना भर कर दे यह स्वयं न्यायाधीश बन कर उसको भगवा आतंकी करार दे फाँसी की सज़ा भी मुकर्र कर देते हैं। इनका एक बडा जमात है जिसके अगुवा है ससुर दामाद की जोडी - अर्जुन और दिग्विजय, इस्के अतिरिक्त, महेश भाट (sorry भट्ट) जिसके बेटे ने आतंकी हेडली की मदद की थी, बरखा दत्त, राजदीप, प्रनय, विनोद, लगभग समस्त पत्रकार बिरादरी, मानव अधिकारों की बात करने वाले, आदि आदि।
७.सेना के मनोबल से खिलवाड - अगर कोइ अलगाववादी हथियार डालता है तो सरकार उसके पुनर्वास के लिये पूर्ण प्रयत्न करती है, पूरा खर्च उठाती है। उस पर कोई भी जवाबदेही भी नही होती है। इसकी तुलना जरा सेना से करें- मेडल पाने वाले जवान को मात्र ५०० रुपये, एवं 4060 पेंशन, अलगाववादियों पर गोली ना चलाने के निर्देश क्योंकि मानवाधिकार वाले उनके पक्ष मे जाच का दबाव बनाने मे निरत। अब तो अगर किसी को सीमा पार करते समय भी मारा तो खैर नही, हाल ही मे एक पूरी टुकडी को जाच के घेरे मे ला दिया गया है। उस पर कोढ मे खाज़ - सेना के सिपाही को रिटायर होने पर एक रैंक एक पेंशन की सुविधा अब भी नहीं मिल रही, प्रधानमंत्री के द्वारा संसद मे घोषण के बाद भी।

बिन्दु और बहुत से हैं पर अभी सिर्फ इतना ही|
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3 comments:

Suresh Chiplunkar said...

आप की सोच बिलकुल सही दिशा में है… इन समस्याओं पर विचार करने में देश के मीडिया और नेताओं की नानी मर जाती है। आप इन पर सतत लिखते रहें… मेरी शुभकामनाएं

Dhananjay Sharma said...

All politician are thinking only about their "Kurshi" not for country.

How can we think about country ?

Ravindra Nath said...

सुरेश जी आप ने मेरे blog पर आ कर इसका मान बढ़ा दिया।

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