बरखा दत्त नाम की एक महिला पत्रकार सिर्फ तो ऐसे बर्ताव कर रही है जैसे कि वो बहुत बडी law scholar या पुरातत्व वेत्ता हो, पर अपने TV studio मे बक बक करना अलग बात है और न्यायालय मे जा कर अपनी बात करना अलग, आखिर TV पर ऐसी भडकाउ बाते करने से TRP बढती है जबकी न्यायालय मे जाने से जमीनी काम करना पडेगा, वहाँ कोई साधारण इंसान नही बैठता जिसको यह लोग मूर्ख बना सकें।
वामपंथी राजनेता अपना स्यापा अलग ही कर रहे हैं, आखिर उन्होने इस देश के मान बिन्दुओं को मटियामेट करने का जो बीडा उठाया हुआ है उस पर न्यायालय ने एक बडा सा अवरोधक जो लगा दिया। इस लोगो को देख कर ऐसा लगता है जैसे वामपंथ आंदोलन धर्म के विरुद्ध नही मात्र हिन्दु धर्म के विरुद्ध है।
यह सब होने के बाद भी जब आम मुस्लिम नही भडका तो मुलायम से नही रहा गया और लगा दिया अपना trademark तडका कि मुस्लिमों के साथ अन्याय हुआ है अरे भाई अगर निर्णय पसंद नही आया तो न्यायालय जाओ न। अब हिन्दुओं के साथ ही कौन सा न्याय हो गया है, जब सभी सबूत चीख चीख कर वहां मंदिर की उपस्थिति दर्शा रहें हैं ऐसे मे १/३ हिस्सा मुस्लिमों को किस खुशी मे, पर हिन्दुओं ने सदैव की भांति अपना धैर्य नही खोया है और कोई भी निर्णय अदालत के फैसले को पूरी तरह से पढने के बाद ही लेगें।
अब देखते हैं कि जब मुस्लिम समुदाय इस विषय पर संयम से है (यद्यपि वो सर्वोच्च न्यायालय जाने की बात कर रहा था पर आंदोलन की नही) तो इस पर मुलायम के पेट मे मरोड क्यों हो रहा है, साधारण सी बात है, इस्लाम खतरे मे है कह कर ही तो वोट लेते आए हैं तो शांति कैसे हजम होगी।
अंततः वह हो ही गया जिसका मुलायम को इंतजार था, दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी ने एक मुस्लिम पत्रकार को जान से मारने की धमकी दी जब उसने कुछ असहज करने वाले सवाल पूछे तो। जी हाँ एक मुस्लिम पत्रकार को (दास्तान-ए-अवध के एडिटर मोहम्मद वाही चिश्ती), अगर कहीं किसी हिन्दु ने यह सवाल पूछे होते तो शायद वो अपनी धमकी पर अमल भी कर चुके होते। इस प्रकार की घटना यदि किसी भाजपा या विहिप के पदाधिकारी के साथ हुई होती तो मीडिया को तो अब तक एक बहुत पसंदीदा मसाला मिल गया होता, पर हत् भाग्य ऐसा नही हुआ।


5 comments:
रविन्द्र जी ,
आप ने एक दम सही नब्ज पकड़ी है .
साल भर पहले ही मैंने ये खबरिया चैनल ( टीरपीबाज) देखना ही छोड़ दिया . हिन्दू का अर्थ ही सम्प्रदाईक है लेकिन मुल्ला मुलायम धर्मनिरपेक्ष है .
हिन्दू शक्ति बहुत जल्द ही जागेगी और इन सब से हिसाब मांगेगी .
संगत की रंगत: एक हितशिक्षा
सद् भावना के रंग, बैठें जो पूर्वाग्रही संग।
संगत की रंगत तो, अनिच्छा ही लगनी हैं॥
जा बैठे उद्यान में तो, 'महक' आये फ़ूलों की।
कामीनी की सेज़ बस, कामेच्छा ही जगनी है॥
काजल की कोठरी में, कैसा भी सयाना घुसे।
काली सी एक रेख, निश्चित ही लगनी है॥
कहे कवि 'सुज्ञ'राज, इतना तो कर विचार।
कायर के संग सुरा की, महेच्छा भी भगनी है॥
http://shrut-sugya.blogspot.com/2010/10/blog-post_18.html
सुज्ञ जी कविता लेखन कभी भी मेरा क्षेत्र नही रहा, और मेरे ब्लोग इन मोतियों से मर्हूम ही रहे, धन्यवाद आपने एक कविता यहाँ डाली, मेरे ब्लोग की शोभा बढ गई।
वास्तव में मुलायम और बरखा दत्त जैसे लोग धिक्कार के योग्य है .अदालत फैसला आते ही करीब पांच मिनट बाद ही यह लोग चिल्लाने लगे की फैसला आस्था के आधार पर हुआ है .और इसमे सबूतों पर गौर नही किया गया .मुसलमानों को ठगा गया है .जबकि दूसरे ही दिन सेवानिवृत्त जज शर्मा ने कहा की 860 फैसले में सभी पहलुओं पर विचार किया गया है ,जिसमे आस्था भी एक पहलू है इस फैसले में 31 Enclosure है
इससे सही फैसला नही आ सकता था ..पर कुछ लोग देश में शांति नही देख सकते .
वोट की खातिर देश को तो क्या अपने माँ बेटी को भी बेच सकते है
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