वैसे हमे इन सबसे कोई फर्क नही पडता है पर जब यह प्रवृत्ति देशहित को ताक पर रख अपने स्वार्थ सिद्धि को ही सर्वोपरि बना लेता है ऐसे मे इन दुष्प्रवृत्तियों को नज़रंदाज करना इस देश की जनता की सुरक्षा के साथ खिलवाड करना साबित हो सकता है। ऐसी ही प्रवृत्ति से पीडीत एक महिला है - अरुंधति रॉय। इसकी पहचान है कि यह एक ख्यातिनाम लेखिका है। इसने अब तक मात्र एक ही उपन्यास लिखा है ऐसे मे इसको इतना सर पर बिठाने की मीडिया की प्रवृत्ति समझ से परे है। कई बार तो ऐसा लगता है कि यह गुरुदेव रवीन्द्र नाथ से भी बडी लेखक है क्योंकि गुरुदेव को भी प्रसिद्धि पाने के लिए ताउम्र लिखना पडा था। इसकी दूसरी खूबी यह है कि यह झूठ बोलने मे निष्णात है। इसके झूठ की एक लम्बी फेहरिस्त है जिसमे से कुछ नीचे दिए हुए हैं:-
१. अहमदाबाद दंगों मे एहसान जाफरी की बेटियों से दंगाईयों ने बलात्कार किया। सच क्या है? सच यह है कि उस दौरान एहसान जाफरी की बेटियाँ अमरीका मे थी भारत मे नहीं इसकी पुष्टी स्वयं एहसान जाफरी की विधवा ने की है।
२. अहमदाबाद दंगों मे एक महिला का पेट चीर कर भ्रूण को बाहर निकाल लिया गया था। सच क्या है? इसकी जानकारी तीस्ता और अरुंधत्ति को कैसे हुई एक बडा प्रश्न है क्योंकि न तो कोई डॉ या प्रत्यक्षदर्शी ही इसकी पुष्टि के लिए सामने आया है अब तक।
३. दांतेवाडा मे CRPF जवानों के नरसंहार पर वो कहती है "I salute the people of Dantewada who have stood up against such a mighty state. Was there any other alternative to the people of Dantewada? The tribals have been neglected for decades. And now when they have started protesting against this injustice, the government is waging war against them," जबकि यह सिद्ध होता जा रहा है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों मे विकास के सबसे बडे शत्रु नक्सली ही हैं। अगर राज्य सरकारों ने इन क्षेत्रों मे विकास को अनदेखा किया है तो निश्चय ही यह अपराध है परंतु राज्य सरकारें जबरन १०-१२ वर्ष के बालकों को उनके माता पिता से अलग कर युद्ध क्षेत्र मे नही झोंक देती जैसा कि नक्सली कर रहे हैं ऐसे मे असली खलनायक कौन है और यह मंदबुद्धि महिला किसे खलनायक बता रही है स्पष्ट है।
४. केरल मे इसने अपना एक प्रेस कांफ्रेंस रद्द कर दिया जब इसे मालूम पडा कि वहां उससे कुछ असहज करने वाले प्रश्न पूछे जाने हैं कारण पूछने पर कहती है कि केरल के पत्रकार मेरे जबावो से ज्यादा मेरे वक्षों पर ध्यान देते हैं, ऐसा लगता है कि यह स्वयं को बिपाशा से भी बेहतर समझती है, ऐसे मे यह फिल्म उद्योग मे क्यों नही आ जाती? नही आ सकती है, जिन्होने इसकी तस्वीर नही देखी है google मे search कर लीजीए मालूम चल जाएगा कि यह एक ऐसी वस्तु पर नज़र डालने का आरोप है जो वास्तव मे है ही नहीं।
५. देवबंद मे एक जनसभा मे (२८ फरवरी २००८ को) यह महिला कहती है कि "सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उनके पास अपफजल गुरु को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं है।" इससे बडा झूठ और क्या हो सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है यह लगता है सिर्फ इसको ही मालूम है, क्योंकि और तो किसी के मुँह से ्मैने तो आजतक यह बात नही सुनी।
६. और अब यह कहती है कि "कश्मीर भारत का अभिन्न अंग कभी नहीं रहा। इस तथ्य को भारत सरकार ने भी स्वीकार किया है।" सच क्या है? सच यह है कि कश्मीर का विलय भारत मे २६ अक्टूबर १९४७ को महाराजा हरिसिंह और नेहरु के हस्ताक्षर करने के साथ ही हो गया था और यही भारत सरकार का अधिकारिक रुख है अंतरराष्ट्रीय मंचों पर। यह भी यह कहती है कि कश्मीर की जनता आजादी चाहती है, प्रश्न है कि कश्मीर की जनता मात्र को यह निश्चित करने का हक किसने दिया? यदि कभी आत्मनिर्णय की बात आई भी तो उसमें जम्मू और लद्दाख के अतिरिक्त कश्मीर से निर्वासित कश्मीरी पण्डित भी अपना मत देंगे।
इसके अतिरिक्त और बहुत सी ऐसी घटनाएं एवं लिख हैं इसके जो यह सिद्ध करती है कि इस महिला का एकमात्र उद्देश्य प्रचार पाना मात्र है और कुछ नही उसके लिए यह झूठ पर झूठ बोले जा रही है।


14 comments:
नो कमेंट...
चीन में जाना चाहिये इन्हें.
ये भारत है भारत यहाँ देश द्रोहियों की जाड़े पूछ है अरुंधती राय के खातो की जाच होनी चाहिए अभी-अभी दिल्ली में अल्गाव्बदी सम्मलेन में जो बोला वह तो सरकार द्वारा प्रायोजित था काश्मीर पर सौदा हो चुका है जानता क़ा नब्ज टटोलने के लिए ये है इस नाते केंद्र सरकार अरुंधती राय में कोई खोट नजर नहीं आता ------ खोट तो राष्ट्रबादियो में नजर आता है उन्हें आतंकबादी करार दिया जा रहा है .ये भारत है भारत.
भारतीय समाज में बुद्धजीवी का दर्जा पा चुकी अरुंधती रॉय ने कहा है कि कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न हिस्सा रहा ही नहीं है. गिलानी दिल्ली में सेमिनार में कह रहें है कि उन्हें आज़ादी से कम कुछ भी नहीं चाहिए. गिलानी अगर ऐसी बात कहें तो कोई हैरानी नहीं होती लेकिन अरुंधती ऐसा कहें तो आश्चर्य होता है. हालांकि इसके पहले भी अरुंधती रॉय एक ऐसा ही बयान दे चुकी हैं. तब उन्होंने मावोवाद का समर्थन किया था. कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा ना मानने सम्बन्धी बयान वहां पर अपनी जान कि बाज़ी लगा रहे जवानों के लिए एक तमाचा है. साथ ही शेष देश के लोगों के लिए क्षोभ और शर्मिंदगी की वजह है.
उसका बस चले तो वो हिंदुस्तान के सिर्फ इसलिए टुकड़े टुकड़े कर दे क्यूंकि ऐसा करने से वो भीड़ से अलग नजर आएगी। उसके पास हत्याओं को वाजिब ठहराने के तमाम तर्क हमेशा मौजूद रहते हैं ,क्यूंकि इसे वो खुद को महान साबित करने का औजार समझती है। संभव है इसके बहाने वो नोबेल पुरस्कार पाने की कोशिश कर रही हो। वो वामपंथ का ऐसा क्रूर चेहरा है जिसका इस्तेमाल मीडिया कभी अपनी टीआरपी बढाने में तो कभी व्यवस्था के विरुद्ध अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए करता है। संभव है बहुतों को उससे मोहब्बत हो लेकिन हम अरुंधती को लानत भेजते हैं क्योंकि उसे राष्ट्र के अस्तित्व से नफरत है।
दीपावली के इस पावन पर्व पर ढेर सारी शुभकामनाएं
मेरे भाई हिन्दुस्तान मे राजनीति के हमाम मे सब नंगे है।
सारी पार्टियां चोर चोर मोसेरे भाई हैं ये पब्लिक को दिखाने के
लिये एक दूसरे के विरोधी हैं। देश मे जितने भी संगठन या पार्टी है सबका मकसद सत्ता है
बहिरा बांटे रेवड़ी अंधरा चीन्ह चीन्ह के देय
ऐसी कौन सी पार्टी है या ऐसा कौन सा नेता है जो भ्रष्ट नही
है आज कल तो भ्रष्टाचार की होड़ मे संत महत्मा भी कूद पड़े
हैं। राजनीती मे धर्म और धर्म मे राजनीती घुस कर खिचड़ी बन
गयी है। मेन मकसद है पैसा कैसे कमायें करोंड़ो रुपये फूंक कर गद्दी पायी अगले चुनाव मे लगाना है।
अपने भारत मे गुलामी का सैकड़ों साल पुराना जींस फुल फॉम मे है हम और आप लोग ही उसे जिंन्दा रखे हुऐ है जैसे हर नेता हर पार्टी हर संगठन के पीछे भारी भीड़ है। नेता. पार्टी; संगठन; चाहे जो करवा दे गुलाम मरने मारने पर उतारु हो जाते हैं। जितना मंा बाप की इज्जत नही करते अपने बुजुर्गो का कहना नही मानते उससे ज्यादा नेताओं, पार्टी,संगठनो का कहना मानते है इनके कहने पर कुछ भी करने को तैयार है। हमारे पूर्वजो ने मुगलो फिर अंग्रेजों की गुलामी की आज हम नेता पार्टी संगठनो की गुलामी कर रहे है।
जिस दिन ये गुलामी का जींस मर जायेगा उस दिन ये नेता और अपना भारत सुधर जायेगा।
अब देखिये यदि मै किसी पार्टी से जुड़ा हूं तो विरोधी पार्टी के उूपर खीज उतारुंगा क्योकि वो सत्ता मे है जिस दिन मेरी पार्टी सत्ता मे आजायेगी मुझे अपनी पार्टी जिससे मै आस्था से जुड़ा हूं उसकी गलती पर मजबूरी है मै आंखें बंद कर लूंगा।
क्योकि मे गुलामी की जंजीरों से जकड़ा हूं कही न कहीं मेरा स्वार्थ भी जुड़ा है।
भाई खीज कर अपने खून को मत जलाओ कमजोर हो जाओगे। चिल्लाते चिल्लाते कई उूपर चले गये नेताओं को कोई फर्क नही पड़ता मोटी खाल के होते है नेताओ की जात अलग होती है। इनके इंसान का दिल नही रहता और न ये इंसान रह जाते हैं
एक लेख पढ़ा था
अगर दुनिया को बदलना है तो खुद को बदल डालो दुनिया अपने आप बदल जायेगी।
इस जींस को मारने की शुरुआत हमे और आपको करनी पड़ेगी।
फालतू मे अपनी एनर्जी नंगा करने मे वेस्ट कर रहे हैं।
आसमान मे थूंकोगे थूक वापस मंुह पे गिरेगा
पहले हम इस गुलामी से बाहर निकले और फिर दूसरो को निकालने मे ताकत लगाये। हम अपनी ताकत नेताओ या पार्टी या संगठन मे बर्बाद कर देते है
अच्छे प्रयास सार्थक होते है
डाक्टर मुo असलम क़ासमी
कहते है धर्म मूर्खो के लिए नही होता
शायद इसी लिए धरती जनम के इतने साल बाद भी संतो के कुछ चंद नाम ही गिने जा सकते है
जरा इनकी बातो पर गौर फरमाइए
ये भारत को हिन्दू राष्ट बनाने का विरोध करते है और तर्क क्या देते है
क्या है अश्वमेघ यज्ञ?
इस यज्ञ में एक ‘ाक्तिशाली घोड़े को दौड़ा दिया जाता था, जो भी
राजा उसको पकड़ लेता उससे युद्ध किया जाता और उसके राज्य को अपने राज्य
में मिला लिया जाता था।
प्रश्न
यह है कि क्या ‘ाान्तिपूर्ण रह रहे पड़ोसी के क्षेत्र में घोड़ा छोड़कर
उसे युद्ध पर आमादा करना जायज़ होगा? और ‘आ बैल मुझे मार’ वाली कहावत पर
अमल करते हुए ‘ाान्ति से रह रहे पड़ोसी से युद्ध कर के उसके क्षेत्र पर
कब्ज़ा कर लेना, यह कौन सी नैतिकता होगी? और क्या अन्तर्राष्ट्रीय कानून
इस की अनुमति देगा?
ये आर्यावर्त में फैले एक राजपरम्परा थी न की हिन्दू परम्परा
इसी तरह अग्रेजो ने नीति चलायी थी की जिस राजा के संतान नही होगी उसको वो अपने राज्य में मिला लेगे
दुनिया के हर कोने में इस तरह की परम्परा थी
अब इनको क्या लगा की यदि हिन्दू राष्ट हो गया तो भारत का प्रधानमंती एक घोडा छोड़ेगा .जो अगर पकिस्तान या चीन में घुस गया
तो वह से हमें लड़ाई करनी पड़ेगे
सही मायने में भारत ने आज तक कभी लड़ाई की पहल ही नही की ,सदेव बचाव किया है
लड़ाई सदेव इस्लाम धर्म के ठेकेदार पकिस्तान ने किया है और जो भी इस्लाम राष्ट है उनकी हालत कुत्तो से भी बेबतर है
हा हा हा हा हा हा हा
BAAS Voice का आमंत्रण :
आज हमारे देश में जिन लोगों के हाथ में सत्ता है, उनमें से अधिकतर का सच्चाई, ईमानदारी, इंसाफ आदि से दूर का भी नाता नहीं है। अधिकतर तो भ्रष्टाचार के दलदल में अन्दर तक धंसे हुए हैं, जो अपराधियों को संरक्षण भी देते हैं। इसका दु:खद दुष्परिणाम ये है कि ताकतवर लोग जब चाहें, जैसे चाहें देश के मान-सम्मान, कानून, व्यवस्था और संविधान के साथ बलात्कार करके चलते बनते हैं और किसी को सजा भी नहीं होती। जबकि बच्चे की भूख मिटाने हेतु रोटी चुराने वाली अनेक माताएँ जेलों में बन्द हैं। इन भ्रष्ट एवं अत्याचारियों के खिलाफ यदि कोई आम व्यक्ति, ईमानदार अफसर या कर्मचारी आवाज उठाना चाहे, तो उसे तरह-तरह से प्रता‹िडत एवं अपमानित किया जाता है और पूरी व्यवस्था अंधी, बहरी और गूंगी बनी रहती है। यदि ऐसा ही चलता रहा तो आज नहीं तो कल, हर आम व्यक्ति को शिकार होना ही होगा। आज आम व्यक्ति की रक्षा करने वाला कोई नहीं है! ऐसे हालात में दो रास्ते हैं-या तो हम जुल्म सहते रहें या समाज के सभी अच्छे, सच्चे, देशभक्त, ईमानदार और न्यायप्रिय लोग एकजुट हो जायें! क्योंकि लोकतन्त्र में समर्पित एवं संगठित लोगों की एकजुट ताकत के आगे झुकना सत्ता की मजबूरी है। इसी पवित्र इरादे से भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) की आजीवन सदस्यता का आमंत्रण आज आपके हाथों में है। निर्णय आपको करना है!
http://baasvoice.blogspot.com/
अरुंधती राय का गैर-जिम्मेदाराना वक्तव्य , उनकी वाहियात देशद्रोही मानसिकता को दर्शाता है। कहते हैं मित्रों से इंसान की पहचान होती है । जिसके 'गिलानी ' जैसे साथी होंगे, उनसे अपेक्षा ही क्या की जा सकती है।
इसी सन्दर्भ में एक लेख लिखा है -
काश्मीर को आज़ाद होना चाहिए -- भूखे नंगे हिंदुस्तान से -- अरुंधती रॉय
http://zealzen.blogspot.com/2010/10/blog-post_5762.html
.
बहुत सही बात कही है आपने...............
रविन्द्र नाथ जी @आप की शिकायत को दूर कर दिया गया हे ,मेने वो कमेन्ट रिमूव कर दिया हे ,
अब हिन्दू का दिल तो आप जानते ही हो |उस रात वाइन के नशे में होने के कारण शायद उसे मानवता वादी बता दिया हो ?
आज आम व्यक्ति की रक्षा करने वाला कोई नहीं है! ऐसे हालात में दो रास्ते हैं-या तो हम जुल्म सहते रहें या समाज के सभी अच्छे, सच्चे, देशभक्त, ईमानदार और न्यायप्रिय लोग एकजुट हो जायें
आज आम व्यक्ति की रक्षा करने वाला कोई नहीं है! ऐसे हालात में दो रास्ते हैं-या तो हम जुल्म सहते रहें या समाज के सभी अच्छे, सच्चे, देशभक्त, ईमानदार और न्यायप्रिय लोग एकजुट हो जायें
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