आजकल एक प्रवृति बहुत ही जोर शोर से बढ रही है, प्रचार पाने की भूख, येन केन प्रकारेण प्रचार पाने की भूख। इसके उदाहरण नित्य प्रतिदिन मिलते रहते हैं, कुछ प्रचार पाने हेतु सामजिक वर्जनाओं को लांघते हैं तो कुछ कानून तोडते हैं, कुछ दुस्साहसिक कार्य करते हैं तो कुछ सत्कार्य भी करते हैं परन्तु आजकल दुष्कर्म करके जितना प्रचार मिलता है उसके मुकाबले समान मेहनत करके सत्कर्म कर १०वां हिस्सा ही प्रचार मिलता है - उदा. आज किसी से भी पूछ लीजीए, वो बाबा आमटे को जानता हो या न जानता हो पर राहुल महाजन को जरूर जानता है।
वैसे हमे इन सबसे कोई फर्क नही पडता है पर जब यह प्रवृत्ति देशहित को ताक पर रख अपने स्वार्थ सिद्धि को ही सर्वोपरि बना लेता है ऐसे मे इन दुष्प्रवृत्तियों को नज़रंदाज करना इस देश की जनता की सुरक्षा के साथ खिलवाड करना साबित हो सकता है। ऐसी ही प्रवृत्ति से पीडीत एक महिला है - अरुंधति रॉय। इसकी पहचान है कि यह एक ख्यातिनाम लेखिका है। इसने अब तक मात्र एक ही उपन्यास लिखा है ऐसे मे इसको इतना सर पर बिठाने की मीडिया की प्रवृत्ति समझ से परे है। कई बार तो ऐसा लगता है कि यह गुरुदेव रवीन्द्र नाथ से भी बडी लेखक है क्योंकि गुरुदेव को भी प्रसिद्धि पाने के लिए ताउम्र लिखना पडा था। इसकी दूसरी खूबी यह है कि यह झूठ बोलने मे निष्णात है। इसके झूठ की एक लम्बी फेहरिस्त है जिसमे से कुछ नीचे दिए हुए हैं:-
१. अहमदाबाद दंगों मे एहसान जाफरी की बेटियों से दंगाईयों ने बलात्कार किया। सच क्या है? सच यह है कि उस दौरान एहसान जाफरी की बेटियाँ अमरीका मे थी भारत मे नहीं इसकी पुष्टी स्वयं एहसान जाफरी की विधवा ने की है।
२. अहमदाबाद दंगों मे एक महिला का पेट चीर कर भ्रूण को बाहर निकाल लिया गया था। सच क्या है? इसकी जानकारी तीस्ता और अरुंधत्ति को कैसे हुई एक बडा प्रश्न है क्योंकि न तो कोई डॉ या प्रत्यक्षदर्शी ही इसकी पुष्टि के लिए सामने आया है अब तक।
३. दांतेवाडा मे CRPF जवानों के नरसंहार पर वो कहती है "I salute the people of Dantewada who have stood up against such a mighty state. Was there any other alternative to the people of Dantewada? The tribals have been neglected for decades. And now when they have started protesting against this injustice, the government is waging war against them," जबकि यह सिद्ध होता जा रहा है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों मे विकास के सबसे बडे शत्रु नक्सली ही हैं। अगर राज्य सरकारों ने इन क्षेत्रों मे विकास को अनदेखा किया है तो निश्चय ही यह अपराध है परंतु राज्य सरकारें जबरन १०-१२ वर्ष के बालकों को उनके माता पिता से अलग कर युद्ध क्षेत्र मे नही झोंक देती जैसा कि नक्सली कर रहे हैं ऐसे मे असली खलनायक कौन है और यह मंदबुद्धि महिला किसे खलनायक बता रही है स्पष्ट है।
४. केरल मे इसने अपना एक प्रेस कांफ्रेंस रद्द कर दिया जब इसे मालूम पडा कि वहां उससे कुछ असहज करने वाले प्रश्न पूछे जाने हैं कारण पूछने पर कहती है कि केरल के पत्रकार मेरे जबावो से ज्यादा मेरे वक्षों पर ध्यान देते हैं, ऐसा लगता है कि यह स्वयं को बिपाशा से भी बेहतर समझती है, ऐसे मे यह फिल्म उद्योग मे क्यों नही आ जाती? नही आ सकती है, जिन्होने इसकी तस्वीर नही देखी है google मे search कर लीजीए मालूम चल जाएगा कि यह एक ऐसी वस्तु पर नज़र डालने का आरोप है जो वास्तव मे है ही नहीं।
५. देवबंद मे एक जनसभा मे (२८ फरवरी २००८ को) यह महिला कहती है कि "सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उनके पास अपफजल गुरु को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं है।" इससे बडा झूठ और क्या हो सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है यह लगता है सिर्फ इसको ही मालूम है, क्योंकि और तो किसी के मुँह से ्मैने तो आजतक यह बात नही सुनी।
६. और अब यह कहती है कि "कश्मीर भारत का अभिन्न अंग कभी नहीं रहा। इस तथ्य को भारत सरकार ने भी स्वीकार किया है।" सच क्या है? सच यह है कि कश्मीर का विलय भारत मे २६ अक्टूबर १९४७ को महाराजा हरिसिंह और नेहरु के हस्ताक्षर करने के साथ ही हो गया था और यही भारत सरकार का अधिकारिक रुख है अंतरराष्ट्रीय मंचों पर। यह भी यह कहती है कि कश्मीर की जनता आजादी चाहती है, प्रश्न है कि कश्मीर की जनता मात्र को यह निश्चित करने का हक किसने दिया? यदि कभी आत्मनिर्णय की बात आई भी तो उसमें जम्मू और लद्दाख के अतिरिक्त कश्मीर से निर्वासित कश्मीरी पण्डित भी अपना मत देंगे।
इसके अतिरिक्त और बहुत सी ऐसी घटनाएं एवं लिख हैं इसके जो यह सिद्ध करती है कि इस महिला का एकमात्र उद्देश्य प्रचार पाना मात्र है और कुछ नही उसके लिए यह झूठ पर झूठ बोले जा रही है।
गूगल की एक अनजानी पर उपयोगी सुविधा
-
गूगल ऑनलाइन और ऑफलाइन बहुत सारी सुविधाएँ देता है ऐसी ही कम जानी पहचानी
सुविधा है Google Url Shortener यानि वेबपते को छोटा करने की सुविधा ।
इस सुविधा के जर...
6 hours ago

